Friday, May 17, 2019

क्यों है हाइपरटेंशन सेहत के लिए घातक ?

प्रत्येक वर्ष 17 मई का दिन वर्ल्ड हाइपरटेंशन डे (World Hypertension Day) के रूप में मनाया जाता है। आज की इस रफ़्तार भरी जीवनशैली (lifestyle) में  ह्रदय सम्बन्धी रोग होना आम बात हो चुकी है। ह्रदय सम्बन्धी  रोगों में एक आम बीमारी जिसे उच्च रक्तचाप या हाइपरटेंशन (Hypertension) या हाई ब्लड प्रेशर (High Blood Pressure) भी कहते हैं, बहुत तेज़ी से फैलती जा रही है। इस बीमारी को साइलेंट किलर (Silent Killer) भी कहा जाता है क्योंकि अधिकतर लोगों को यह पता ही नहीं होता की उन्हें यह बीमारी है। विशेषज्ञों की मानें तो बच्चे भी हाई ब्‍लड प्रेशर के मरीज़ बन सकते हैं। 2017 में यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री (Union Health Ministry) द्वारा नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे  (National Family Health Survey) किया गया जिसमे यह सामने आया की 'हर 8 में से 1 भारतीय हाई ब्लड प्रेशर से ग्रसित है।'


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क्या होता है हाइपरटेंशन ?



हाइपरटेंशन यानी की उच्च रक्तचाप क्या होता है यह जानने से पहले आइये समझते है ब्लड प्रेशर क्या होता है। हमारे शरीर के सभी ऊतक (tissues) और अंगों (organs) को काम करने के लिए ऑक्सीजनेटेड (oxygenated) ब्लड की ज़रुरत होती है। इस ब्लड को पहुंचाने का  काम हमारा सर्कुलेटरी सिस्टम (circulatory system) करता है। मनुष्य का ह्रदय भी इस सिस्टम का ही एक हिस्सा है। ह्रदय के धड़कने पर एक प्रेशर बनता है जो रक्त को हमारी रक्त वाहिकाएं (blood vessels) में पुश करता है। इसी प्रेशर को ब्लड प्रेशर कहते हैं। जब यही ब्लड प्रेशर ज़रुरत से ज्यादा बढ़ जाता है तो इसे 'हाई ब्लड प्रेशर' या 'हाइपरटेंशन' कहा जाता है।


हाइपरटेंशन होने के  कारण -



आधुनिक जीवनशैली, बढ़ती उम्र, मोटापा, शराब व धूम्रपान हाइपरटेंशन के कुछ प्रमुख कारणों में  से है वहीँ फिजिकल इनैक्टिविटी (physical inactivity) से, नमक का अधिक सेवन करने से, बहुत वसा वाला खाना (High fat diet) खाने से, तनाव (stress) में रहने से भी यह आपको हो सकती है। मधुमेह (Diabetes) अथवा थायराइड (Thyroid) की वजह से भी हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत हो सकती है। गर्भवती  महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत होना आम बात है जो की आम तौर पर प्रसव के बाद ठीक हो जाता है।


हाइपरटेंशन के लक्षण -



हाइपरटेंशन की सबसे खतरनाक बात यह है की लोगो को पता ही नहीं चलता की उन्हें यह बीमारी है करीब एक-तिहाई लोगों को हाइपरटेंशन होने की जानकारी नहीं होती और जिन्हें पता चलता भी है वे भी काफी समय निकलने के बाद ही इस बारे में जान पाते हैं कुछ लक्षण जो हाई ब्लड प्रेशर के चलते देखने को मिल सकते हैं उनमें लगातार सरदर्द, थकान या भ्रम, घबराहट या चिंता होना, नज़रों की समस्या, छाती में दर्द, सांस लेने मे तकलीफ, अनियमित दिल की धड़कन, नाक से खून निकलना इत्यादि शामिल है


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हाइपरटेंशन से होने वाले नुकसान -



ब्लड प्रेशर के लगातार बढे रहने से कई समस्याएं खड़ी हो सकती है और इसके वजह से हमारे शरीर के कई अंगों को नुकसान भी पहुंच सकता है इन समस्याओं का मुख्य कारण धमनियों (Arteries) द्वारा अलग अलग अंगों को सही से रक्त न पहुंचा पाना है हाइपरटेंशन के रोगियों को इन निम्नलिखित परेशानियों का सामना करना पड़ता है - दिल का दौरा, स्लीप एपनिया (Sleep Apnea) जिसमे मरीज़ सोते समय कई बार सांस लेना बंद कर देता है, ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) जिसमे हड्डियाँ बिलकुल कमजोर हो जाती हैं, किडनी फेलियर, अनियमित दिल की धड़कन (Arrhythmia), छाती का दर्द (Angina) इत्यादि


हाइपरटेंशन से बचने के उपाय -


हाइपरटेंशन को अपने आप से दूर रखने के लिए हमें इन चीज़ो का सेवन करना चाहिए  -


पोटैशियम (Potassium): इसके लिए आप केला, संतरा, किवी फ्रूट, आलू, राजमा, पालक, दूद, दही, मछलियाँ  इत्यादि का सेवन कर सकते हैं।


कैल्शियम (Calcium): दूध, दही, पनीर, बीन्स, मसूर, हरी पत्तेदार सब्जियां, बादाम, सैलमन मछली इत्यादि का सेवन करने से आपको कैल्शियम मिल सकता है।


मैग्नीशियम : Low Magnesium diet की वजह से भी आपका बीपि  बढ़ सकता है। यह अनाज, हरी पत्तेदार सब्जियों, सूखे मटर, गोभी और सेम में पाया जाता है। Sea-food में भी यह पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता है।


लहसुन (Garlic): कुछ अध्ययनों  में पाया गया है कि लहसुन खाने से भी ब्लड प्रेशर कम होता है। इसके अलावा ये कुछ प्रकार के कैंसर और कोलेस्ट्रॉल घटाने में भी सहायक है।


फिश ऑयल्स (Fish Oil) : मैकेरल (Mackerel) और सैल्मन (Salmon) जैसी मछलियों में “omega-3 fatty acids” पाया जाता है और इसका सेवन करना उच्च रक्तचाप कम करने में सहायक हो सकता है


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अच्छी आदतें अपनाएं और तनाव को दूर भगाएं -


नियमित कसरत, सही खानपान, अपना वजन सही रख कर, नमक का सेवन कम करके, धुम्रपान / शराब का सेवन ना करने जैसी अच्छी आदतें अपना के भी इस बीमारी को दूर रखा जा सकता है सबसे महत्वपूर्ण है मनुष्य का खुश रहना खुश रहिए और तनाव को दूर भगाइये  

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Monday, May 6, 2019

जानिए कैसे करें अस्थमा से अपना बचाव

समय रहते कराएं अस्थमा का इलाज, यह हैं लक्षण


अस्थमा (दमा) तेजी से एक आम बीमारी की तरह फैलती जा रहा ही है। अस्थमा  फेफड़ों की एक बीमारी है जिसके कारण मरीज़ को सांस लेने में कठिनाई होती है। दरअसल अस्थमा होने पर श्वास नलियों में सूजन आ जाती है जिस कारण श्वसन मार्ग सिकुड़ जाता है। श्वसन नली में सिकुडऩ के चलते रोगी को सांस लेने में परेशानी, सांस लेते समय आवाज आना, सीने में जकडऩ, खांसी आदि समस्याएं होने लगती हैं। अस्थमा अटैक से कई बार मरीज की जान भी जा सकती है। इसलिए अस्थमा के इलाज में लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए।



अस्थमा के कारण 


बाहरी अस्थमा


अस्थमा आमतौर पर दो तरह के होते हैं। बाहरी और आंतरिक अस्थमा। बाहरी अस्थमा एलर्जिकल होता है जो धूल, मिट्टी, धुआं, गर्दा जैसी चीजों से होता है, जिसके प्रभाव में आते ही मरीज को सांस लेने में दिक्कत आती है। इसके अलावा पशु और पक्षियों के परों से निकलने वाले रुएं और धूल से भी बाहरी अस्थमा होता है, जो सांस में एलर्जी पैदा करता है।

आंतरिक अस्थमा


आंतरिक अस्थमा कुछ रासायनिक तत्वों को सांस (श्वसन) द्वारा शरीर में प्रवेश होने से होता है जैसे कि सिगरेट का धुआं, पेंट वेपर्स आदि।

अस्थमा के लक्षण


बलगम वाली खांसी या सूखी खांसी।  सीने में जकडऩ जैसा महसूस होना।  सांस लेने में कठिनाई। सांस लेते समय घरघराहट की आवाज आना।  रात में या सुबह के समय स्थिति और गंभीर हो जाना। ठंडी हवा में सांस लेने से हालत गंभीर होना।  व्यायाम के दौरान स्वास्थ्य और ज्यादा खराब होना।  जोर-जोर से सांस लेना, जिस कारण से थकान महसूस होना। गंभीर स्थिति में कई बार उल्टी लगने की भी संभावना बढ़ जाती है।

अस्थमा के लक्षण 


अस्थमा के प्रमुख कारण


आज के समय में अस्थमा का सबसे बड़ा कारण है प्रदूषण।  कारखानों, वाहनों से निकलने वाले धूएं अस्थमा का कारण बन रहे हैं। सर्दी, फ्लू, धूम्रपान, मौसम में बदलाव के कारण भी लोग अस्थमा की चपेट में आ रहे हैं।

खानपान भी जिम्मेदार


कुछ ऐसे एलर्जी वाले फूड्स हैं जिनकी वजह से सांस संबंधी बीमारियां होती हैं। पेट में अम्ल की मात्रा अधिक होने से भी अस्थमा हो सकता है। इसके अलावा दवाईयां, शराब का सेवन और कई बार भावनात्मक तनाव भी अस्थमा का कारण बनते हैं। अत्यधिक व्यायाम से भी दमा रोग हो सकता है। वहीं  कुछ लोगों में यह समस्या आनुवांशिक होती है।

यूं आते हैं चपेट में


एलर्जिक अस्थमा- एलर्जिक अस्थमा के दौरान आपको किसी चीज से एलर्जी है जैसे धूल-मिट्टी के संपर्क में आते ही आपको अस्थमा हो जाता है या फिर मौसम परिवर्तन के साथ ही आप अस्थमा के शिकार हो जाते हैं। अधिक शारीरिक सक्रियता के कारण अस्थमा हो जाता है तो कई लोग जब अपनी क्षमता से अधिक काम करने लगते हैं तो वे अस्थमा के शिकार हो जाते हैं।
कफ भी अस्थमा का एक प्रमुख कारण होता है। जब आपको लगातार कफ की शिकायत होती है या खांसी के दौरान अधिक कफ आता है तो आपको अस्थमा अटैक पड़ जाता है।

जांच


अस्थमा में खासतौर से फेफड़ों की जांच की जाती है, जिसके अंतर्गत स्पायरोमेट्री, पीक फ्लो और फेफड़ों के कार्य का परीक्षण शामिल है। इसके अलावा बलगम, सांस और फैफड़ो की जांच से भी अस्थमा का पता लगाया जाता है।

उपचार


अस्थमा का उपचार तभी संभव है जब आप समय रहते इसे समझ लें। अस्थमा के लक्षणों को जानकर इसके तुरंत निदान के लिए डॉक्टर के पाए जाएं। अस्थमा के उपचार के लिए इसकी दवाएं बहुत कारगर हो सकती हैं। अस्थमा से निपटने के लिए नाक के माध्यम से दी जाने वाली दवा और अस्थमा नेब्यूलाइजर का भी प्रयोग उपचार में किया जाता है। इसके अलावा सांस का पंप भी मरीज को दिया जाता है, जिसके सहारे मरीज को सांस लेने में आसानी होती है।




बचाव


अस्थमा में इलाज के साथ बचाव की अवश्यकता ज्यादा होती है। अस्थमा के मरीजों को बारिश और सर्दी से ज्यादा धूल भरी  आंधी से बचना चाहिए। बारिश में नमी के बढऩे से संक्रमण की संभावना ज्यादा होती है। इसलिए खुद को इन चीजों से बचा कर रखें।  ज्यादा गर्म और ज्यादा नम वातावरण से बचना चाहिए। धूल मिट्टी और प्रदूषण से बचें।  घर से बाहर निकलने पर मास्क साथ रखें। यह प्रदूषण से बचने में मदद करेगा।




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Monday, April 22, 2019

क्या हैं जेनेरिक दवा?

जेनेरिक दवायें (Generic Medicines) आखिर हैं क्या? क्यों होती है जेनेरिक दवायें सस्ती !


देशभर में स्वास्थय सुविधाओं को आम आदमी की पहुंच में लाने के लिये विभिन्न स्तरों पर काम किये जा रहे है। सरकारी प्रयासों के बावजूद भारत में इलाज़ अभी भी काफी महंगा है और इसमें एक बड़ा खर्च दवाइयों पर होता है। दवाइयों पर होने वाले खर्चों में कमी लाकर जेनेरिक दवा (Generic medicine) नामक शब्द ने घर-घर में अपनी पहचान बना ली है। लेकिन आज भी कई बार यह सवाल उठता है कि क्या जेनेरिक दवाएं कोई खास तरह की दवा है और इसकी कीमत इतनी कम कैसे हो सकती है?




जेनेरिक दवा किस तरह ब्रांडेड दवा (branded medicine) से अलग है ?


जेनेरिक दवाइयों को लेकर समाज में काफी जागरूकता आ रही है वहीं एक बड़ा हिस्सा आज भी यह मान बैठा है कि ब्रांडेड दवा (branded medicine) और जेनेरिक दवा (generic medicine) की क्वालिटी (quality) में कुछ फर्क हो सकता है। जबकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं होता है। दवा कंपनियां बीमारी के इलाज़ को लेकर निरंतर शोध (research) करती है और इसमें सफल होने पर दवा को साॅल्ट (salt) रूप में पंजीकृत (register/patent) कराती है। यही साॅल्ट दवा के रूप में निर्धारित मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है जिसे दवा कंपनियां अपने-अपने ब्रांड्स के रूप में बेचती है, जिसकी कीमत स्वाभाविक रूप से अलग-अलग होती है, कोई ब्रांड मंहगा बिकता है तो कोई सस्ता। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि जेनेरिक दवा में भी यह सॉल्ट समान होता है।


पेटेंट दवा (patented medicine) कब बनती है जेनेरिक दवा ?


एक बार पेटेंट की अवधि बीत जाने के बाद कोई भी दवा कंपनी उस साॅल्ट का इस्तेमाल कर सकती है। साॅल्ट का जेनेरिक नाम दुनियाभर में समान होता है और उसी साॅल्ट को दवा कंपनियां जेनेरिक नाम से बेच सकती  है। जेनेरिक दवा और ब्रांडेड दवा की कीमतों में अंतर चैकानें वाला होता है जोकि कई बार 90 प्रतिशत का भी हो जाता है। जी हाँ सही पढ़ा आपने, जेनेरिक दवा, ब्रांडेड दवा की तुलना में 90 प्रतिशत तक सस्ती हो सकती है। यह फर्क पड़ता है ब्रांडेड दवा में जुड़ने वाले कई तरह के खर्चों जैसे, अधिक मुनाफा, प्रमोशन एवं विज्ञापन आदि में।


जेनेरिक दवा की क्वालिटी संदेह से परें ?


जेनेरिक दवाइयों की कीमतें ब्रांडेड दवाइयों की तुलना में बेहद कम होती है इसी कारण उपभोक्तावादी मानसिकता के चलते कई बार लोग यह भ्रम बैठा लेते है कि जेनेरिक दवाइयों की क्वालिटी कुछ कमतर है। इस बारें में सबसे बड़ी कमी है समाज में जागरूकता का अभाव। जेनेरिक दवाइयों की क्वालिटी, साइड इफेक्ट उनका शरीर पर पड़ने वाला प्रभाव बिलकुल समान होता है। जेनेरिक दवाईयां भी किसी भी अन्य ब्रांड की दवाइयों के समान क्वालिटी स्टैण्डर्ड को पास करती है और प्रमाणित की जाती है। इसलिये समय आ गया है कि भारत में जेनेरिक दवाइयों की क्रांति का प्रसार हो, जिससे आम लोगों के इलाज़ के खर्चे मे कमी लायी जा सकें।  


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दवाइयों के स्टोरेज में लापरवाही पड़ सकती है भारी

दवाइयों का उपयोग दिन - प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है  l  हालांकि कई बार यह शिकायत भी रहती है की डॉक्टर द्वारा लिखी गयी दवाएं असर नहीं कर रही है ...